एक तरफ सरकार और प्रशासन जल संरक्षण, भूजल बचाने और पारंपरिक जल स्रोतों को संजोने के बड़े-बड़े दावे कर रही है... तो वहीं दूसरी तरफ बैकुंठपुर में उन्हीं दावों की हकीकत सवालों के घेरे में है... शहर के बीचों-बीच स्थित एक पुराने सरकारी कुएं को कचरे और मलबे से भरकर खत्म करने की तैयारी चल रही है... अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले दिनों में यह लापरवाही भारी पड़ सकती है...
मामला बैकुंठपुर के व्यस्त इलाके कुमार चौक, बालमंदिर के पास स्थित सरकारी कुएं का है... स्थानीय लोगों के मुताबिक यह कुआं कभी पूरे इलाके के लिए शुद्ध पेयजल का बड़ा सहारा था... सालभर इसमें पानी भरा रहता था और लोग रोजमर्रा के उपयोग के लिए इसी पर निर्भर रहते थे...
लेकिन बीते करीब डेढ़ साल से इस कुएं में लगातार कचरा और मलबा डाला जा रहा है... अब हालत यह है कि कुआं पूरी तरह पाटे जाने की कगार पर पहुंच गया है...
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हर साल जल संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, तब ऐसे प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा...? विशेषज्ञ मानते हैं कि गिरते भूजल स्तर, भीषण गर्मी और बढ़ते जल संकट के दौर में ऐसे पारंपरिक जल स्रोत जीवनरेखा साबित हो सकते हैं... ऐसे में एक उपयोगी कुएं को खत्म करना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है...


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