स्वच्छता के दावों और हकीकत के बीच का फर्क अगर देखना हो, तो नगर पालिका परिषद बैकुंठपुर की तस्वीर काफी है। हर साल स्वच्छता रैंकिंग में पिछड़ने वाला यह नगर, इस बार भी गंदगी के कारण फिसड्डी साबित होता नजर आ रहा है। नगर के लगभग हर वार्ड में गंदगी का अंबार लगा हुआ है। सड़क किनारे कचरे के ढेर, नालियों में जमी गंदगी और बदबू से लोग परेशान हैं। हालात यह हैं कि नगर पालिका में 100 से ज्यादा सफाई कर्मचारी होने के बावजूद सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है।
कचरे के ढेरों के बीच आसपास घूमने वाले गाय और बैल इसी कचरे को खाकर अपना पेट भर रहे हैं। प्लास्टिक खाने के कारण लगातार मवेशियों की मौत के मामले भी सामने आ रहे हैं, लेकिन जिम्मेदार आंख मूंदे बैठे हैं।
नगर पालिका द्वारा कचरा छंटाई और आधुनिक मशीनों के उपयोग के दावे किए जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि लाखों-करोड़ों रुपए की मशीनें जंग खा रही हैं और कचरे की छंटाई सिर्फ कागजों तक सीमित है। हर वार्ड में हालात एक जैसे हैं—न कहीं नियमित सफाई, न कचरा प्रबंधन की ठोस व्यवस्था।
अब सवाल यह है कि जब संसाधन और कर्मचारी दोनों मौजूद हैं, तो आखिर सफाई व्यवस्था पटरी पर क्यों नहीं आ पा रही? क्या जिम्मेदारों पर कार्रवाई होगी या फिर हर साल की तरह इस बार भी बैकुंठपुर स्वच्छता में फिसड्डी ही रहेगा?




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